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बुधवार, जून 13, 2012

भगवत गीता में लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग

एक रुसी अदालती आदेश के कारण गीता पिछले दिनों चर्चा मैं थी. अन्तराष्ट्रीय स्तर पर यह दूसरी बार हुआ था जबकि इस ग्रन्थ के अर्थघटन में भूल की गई हो.  यदि गीता को सही संदभों में पढ़ा जाये तो संभवतः  गीता से बेहतर मार्गदर्शक शायद ही ढूंदा जा सके
कई बार विशिष्ट प्रतिभाशाली व्यक्ति भी अपनी एकाग्रता खो बैठते हैं जैसे कि सचिन तेंडुलकर अपनी सौवीं सेन्चुरी के लिए एक वर्ष से अधिक इन्तजार करते रहे.  अर्जुन भी ऐसी ही दुविधा मैं थे. श्रीकृष्ण ने जिस उनका मार्गदर्शन किया वह संभवतः  तेंडुलकर जैसी  स्तिथि मैं मददगार हो सकता है.  सफलता के इस सूत्र हम को तलाशते हैं.  
श्र्लोक ३०  दो स्थियों के बारे मैं कहता है :
(१) उर्जा का संकलन और
(२) उर्जा का उचित विस्थापन
लक्ष्य छेदन के लिए जरुरी है कि वैचारिक स्तर को निजी स्वार्थ से ऊपर उठाया जाये. बुद्धि और लक्ष्य का सामंजस्य सिद्धि हासिल करने में मदद करता है. हवा और पानी अपनी ताकत तभी पाते हैं जब वह एक ही दिशा मे बह रहे हों.
उस्ताद ज़ाकिर हुसैन को तबले की महारत इसलिए हासिल हुई क्योंकि उनके दिल और दिमाग पर केवल एक ही चीज़ छाई थी – तबला. उनकी समस्त उर्जा उँगलियों से होकर तबले पर पहुंचती है और श्रोतागण कह उठते हैं वाह उस्ताद !!!
व्यक्ति  जब लक्ष्य की ओर बढ़ता है तो अधिक उर्जा का संचार होता है. यह अतिरिक्त उर्जा सफलता की वजह बन जाती है. आलसी मनुष्य इस उर्जा को महसूस नहीं कर सकता और सफलता उससे दूर हो जाती है.
कुछ छात्र मेहनत तो बहुत करते हैं पर वांछित सफलता नहीं पाते क्योंकि उन्हें स्वयं पर विश्वास नहीं होता है और अपनी ऊर्जा को लक्ष्य की तरफ ना मोड़कर अन्यत्र गवांने लगते हैं. जब स्वयं पर विश्वास ना हो तो सचिन के  99   शतक से सौंवे का रास्ता लम्बा हो जाता है.
VINOD KAMBLI

कर्मयोग के तीसरे अद्ध्याय के ३०वे श्र्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं,” आत्मनिष्ठ चित्त से परिणाम की आशा के बिना मोह और शोक के बंधन से मुक्त हो युद्ध कर”. किसी भी तरह का भावनात्मक बंधन निरंतरता को बाधित करता है.
कुछ लोग विनोद काम्बली को सचिन से अच्छा मानते थे, परन्तु निरंतरता की कमी के कारण काम्बली बहुत ही जल्दी सचिन से पिछड़ गया. वह अपनी ऊर्जा को लक्ष्य की ओर केंद्रित रखने के स्थान पर अन्यत्र धकेलता रहा.  परिणाम हमारे सामने है.  ऐसा कई बार होता है जब व्यक्ति पहली सफलता को ही बार बार भुनाने की कोशिश करता है और निरंतर सफलता हासिल करने के प्रयास की बजाय भुनाने  में लगाता रहता है. जल्द ही लोग उसकी प्रारम्भिक सफलता को भी भूल जाते हैं.
दूसरे अद्ध्याय में सही कहा गया है कि जिस तरह समुद्र में कई दिशाओं से कई तरह का पानी आकर मिलता है, पर समुद्र सब कुछ जज्ब करके भी शांत रहता है. उसी तरह जो लोग सुख, दुःख सभी तरह की प्रतिक्रियाओं को जज्ब कर लक्ष्य की ओर लगे रहते हैं सफलता उन्हें वर लेती है.

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